Tuesday, April 21, 2020

पिघलता सा आसमान

कितना आसान है एक आज़ाद पंछी की उड़ान को रोक पाना ??उसके पंखों को नोंच कर फेंक देना या फिर उसके अस्तित्व को अलग सांचे में ढालने  की कोशिश करना  ,पर क्या इतना सब करने पर भी आप कामयाब हो पाते हो ,तो यहाँ पर जवाब है नहीं,बिलकुल भी नहीं ,क्योंकि जिसने आसमान को छूने का सपना देख लिया है वो इन नाकाम कोशिशों से नहीं डरता और आगे बढ़ता जाता है।
क्या तेज़ाब की एक छोटी सी बोतल किसी के सपनों पर पानी फेर सकती है या वो पिघलता शरीर अपने भविष्य की इमारतों को गिरा सकता है ,अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आप यहाँ पर गलत है ,एक इंसान तब तक नहीं हार  सकता जब तक वो खुद से न हार जाये।
पर यहाँ पर ये सोचने की ज़रूरत है कि क्या  मानसिक स्थिति होती है जब कोई  एक ऐसे चेहरे पर तेज़ाब डालने की सोचता है  जिसे वह  प्यार करने का दावा करता है ,जिसके साथ सारी  ज़िन्दगी बिताना चाहता है और उसकी एक न सुनने पर वो उसे झुलसा देता है ,क्या ये प्यार है ?
प्यार का मतलब हम क्यों हमेशा सही नहीं समझ पाते ,क्या ज़रूरी है प्यार बॉलीवुड की फिल्मों जैसा ही हो ,क्या  ज़रूरी है उसके माथे पर आपके नाम का लेबल लगाना या फिर उसी के साथ सारी ज़िन्दगी बिताना, चाहे वो आपके साथ अपनी ज़िन्दगी न बांटना चाहता हो ,किसने दिया आपको ये अधिकार कि आप किसी को मजबूर करे की वो तुमसे प्यार करे नहीं तो छीन लिया जायेगा उसका चेहरा ,पर नहीं छीन सकते उसका आत्मविश्वास ,उसकी पहचान ,जो नहीं मोहताज है किसी चेहरे की और यहाँ पर भी तुम कामयाब नहीं हो पाते हो।
यहाँ पर एक बात है कि अगर दोस्त या परिवार कभी गुस्सा कर दे तो क्या  यही करना चाहिए ?
नहीं न,तो फिर क्यों जिससे प्यार का दावा किया उसके साथ अलग बर्ताव क्यों ??
क्या हुआ अगर वो तुम्हारा नहीं हुआ ,पर तुम तो उससे प्यार करते हो और ये प्यार एक न के बाद क्यों नफरत में बदल जाता है ,अगर ऐसा है तो सोचने की ज़रूरत है कि था ही नहीं और ज़िन्दगी में आगे बढ़ जाइये।
भले ही आप एक रिश्ते में रहने के बाद भी अलग हुए हो , तब भी कड़वी यादें भूल कर ,मीठी यादों के साथ अपना जीवन ,दिल में कोई बोझ रखे बिना बिताइए।
सच में अगर प्यार करते हैं तो उसकी ख़ुशी में  ही अपनी ख़ुशी ढूंढ लीजिये ,क्योंकि प्यार कभी नफरत में नहीं बदलता ,क्या परिवार से दूर होने पर आपका प्यार नफरत में बदल जाता है  तो फिर यहाँ पर सब क्यों बदलता है ??
इसलिए अगर आप किसी से प्यार करने का दावा करते हैं तो उसे इज़्ज़त दीजिये ,खुशियां दीजिये  ,जिससे कि वो भले ही आप से प्यार न करती हो पर आपको सम्मान ज़रूर देगी।
यहाँ पर परिवार और समाज का भी महत्वपूर्ण योगदान है ,दोनों को  ही ज़रूरत है घर में बच्चों को स्वस्थ माहौल मुहैय्या करवाने की ,लड़कियों का सम्मान और उनके अस्तित्व से पहचान करवाने की और उनके दिमाग में औरतों की एक नयी परिभाषा गढ़ने की ,

" कि  नहीं है वो अबला ,वो सशक्त है ,धुरी है ज़िन्दगी की ,
उसके सम्मान में झुकने में तुम भी सम्मान ही पाओगे ,
वो भी तुम जैसी ही है ,उसको भी  पहचान के तो  देखो ,
सिर्फ पत्नी ,माँ ,बहन या बेटी ही क्यों ,
कभी दोस्त ,कभी साथी या किसी अनजान को जान के तो देखो।
अपने ही जैसा पाओगे उसे भी ,वही सोच ,वही परिवार ,वही प्यार ,
कभी इस इस लिंग भेद को  अपनी सोच से निकाल कर तो देखो।
  बस एक रचना ही तो है जो तुमसे कुछ अलग है ,
इस अंतर को कभी एक नयी पहल से मिटा कर तो देखो।
रच डालो एक नया संसार ,कि जिसमें उसे डर  न हो ,
कहीं जलती ,कहीं कराहती और
कहीं इन सबसे बिना गुज़रे हुए भी  वो इसे महसूस करती न हो
अकेले मैं बैठ जो चिल्लाना चाहती हो ,जो दिल खोल  कर रोना चाहती हो ,
उसकी आँखों से बरसते उस दर्द को  जड़ से मिटा कर तो देखो।
हज़ारों सपनें बैठे है उसकी आँखों में ,कभी उन्हें पढ़ कर तो देखो।
वो सशक्त है ,उससे ही संसार  है ,इस सच को स्वीकार  करके तो देखो।

मैंने इस विषय में जो भी लिखा है ,वो लिखने का विचार मुझे "छपाक " फिल्म देखने के बाद आया ,बहुत कुछ चल रहा था मन में ,उसे आज कुछ लाइनों में समेटने की कोशिश की है ,इस फिल्म में हमने एक विजेता का संपूर्ण  संघर्ष देखा है ,और न जाने कितनी ऐसी वीरांगनाएं हैं जो  जीत रही  हैं  दुनिया से ,उस हर सोच से जो इसके पीछे की वजह है और कुछ दुनिया ही छोड़ गयीं हैं ,उन सभी को मेरा नमन है।
पर यहाँ  पर जानने लायक बात यह है कि कोई कितना भी मिटाना  क्यों न चाहे ,हिम्मत की लकीर एक दिन सफलता का रास्ता ज़रूर बनाती है और सपने ज़रूर सच होते है।
अगर मैंने कुछ गलत लिखा हो  तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।
धन्यवाद।


Thursday, April 16, 2020

यमुनोत्री गर्ल्स हॉस्टल @KEC द्वाराहाट

चलिए आपको ले चलती हूँ ,यमुनोत्री गर्ल्स होटल ,कुमाऊं इंजीनियरिंग कॉलेज द्वाराहाट ,गंगोत्री गर्ल्स हॉस्टल अगर आपने नहीं पढ़ा तो आप इसे यहाँ plotsforthoughts.in
 पढ़ सकते हैं ,गंगोत्री गर्ल्स हॉस्टल में जो सबसे यादगार पल है वो है हमारे बर्थडे ,जो रात के 12 बजे सेलिब्रेट होते थे और सब बी ० टेक ० और एम ० सी ० ए ० की लड़कियां साथ मानती थी ,बर्थडे गर्ल को दूसरे रूम में भेजकर रूम को सजाया जाता था ,सब अपनी अपनी विशेज़ लिखते थे और 12 बजते ही शुरू हो जाता था बर्थडे और बर्थडे बम्स ,और बर्थडे गर्ल को हवा में उछालने  का सिलसिला और पार्टी।
सेकंड ईयर में आते ही हम पहुँच गए यमुनोत्री ,जहाँ बी ० टेक ० फाइनल ईयर  और एम ० सी ० ए ० सेकंड ईयर और फाइनल ईयर को रूम्स अलॉट होते थे और वहाँ हमारी वार्डन थी वही डैमी मैडम जिनका असली नाम मुझे आज भी नहीं पता ,लड़कियों से पूछा तो उन्होंने दमदमी माई बताया 😂😂😂 और जब भी वो आती थी सन्नाटा छा जाता था और जाने के बाद हंसी के फुव्वारे 😂😂
गंगोत्री से यमुनोत्री जाने में हम बहुत कुछ पीछे छोड़ आये ,फर्स्ट ईयर की यादें ,वो प्यारी सी त्रिमूर्ति और कुछ जाते हुए लोग जो हमेशा के लिए मन में बस गए ,हमारी बहुत प्यारी सुपर सीनियर्स ,पहले यमुनोत्री में मेस नहीं हुआ   करती थी तो इसलिए हमें गंगोत्री जाने का सौभाग्य मिलता रहा और फिर आये हमारे जूनियर्स ,और अब हम बन चुके थे सीनियर्स ,क्या फीलिंग थी सीनियर बनने की मैं बता नहीं सकती ,और फिर शुरू हुआ रैगिंग लेने का सिलसिला ,वही सब फिर से जो हमने किया था वही हमने भी करवाया ,अरे भई परंपरा थी ,ऐसे कैसे छोड़ देते ऊपर से सीनियर बनने का जोश वो अलग ,फिर वापिस  हम अपने यमुनोत्री ,जहाँ सबको सिंगल रूम मिलता था और बालकनी भी और बीच में सुन्दर सा गार्डन  और गॉंव का नज़ारा जहाँ सुबह लोग खेती करते हुए दिखते थे ,थर्ड सेम तो सिंगल रूम मिलने की ख़ुशी ,पकवान खाने में ,रैगिंग लेने  में और फ्रेशर्स  में, सीनियर्स  को फेयरवेल देने में निकल गया जिसकी बहुत सी यादें हैं ,वो साड़ियों का ट्रायल ,वो ड्रेस कोड ,वो मेकअप करना सीखना और फेयरवेल की तैयारी के पीछे हॉस्टल टाइम के बाद हॉस्टल पहुंचना 😂😂और बहुत सारी  ट्रीट्स और भी बहुत कुछ।
यहाँ पर मैं एक वीडियो के बारे में बताना चाहूंगी जो मेरी प्यारी सहेली पर फिल्माया गया था वो भी उसकी प्लेट में बैठे चावल के एक एक  दाने का 😂😂शायद बहुत ज़रूरी हो 😂 वो बहुत टेंशन में थी पर बाद में पता लगा कैमरा ही ऑफ था 😂😂😂😂😂😂
वो हमारे फैकल्टीज का हॉस्टल कैंपस में घर ,वो सर की बागवानी और सर का गाना जो उन्हें पता नहीं होगा कि हमने सुन लिया था और वो हम पाँचों का हिम्मत करके ,नहीं  बहुत ज़्यादा हिम्मत करके सर के घर जाना और बार बार भाग जाना 😂😂😂😂और फिर से हिम्मत जुटा के असाइनमेंट की डेट आगे बढ़वाना और फिर भागते हुए हॉस्टल वापिस आ जाना 😂😂😂😂और असाइनमेंट्स  का क़हर अब और ज़्यादा बढ़ गया था ,अब टीपने का एकसूत्रीय कार्यक्रम चलने लगा था पर वो भी पकड़ा गया तो शब्द बदले जाने लगे पर काम चल रहा था और दिन की शुरुवात वैसी ही जैसी गंगोत्री में थी बस यहाँ पानी  स्टोर करना होता था ,यहाँ एक मग्गा पानी लेने में उतना ही लौटाना भी होता था बाकायदा निशान लगा के  😂😂 वो हॉस्टल कैंपस  गेट पर एकलौती दुकान जहाँ से रिचार्ज और  मैगी  ली जाती थी ,वो रूम में पुलाव बनाना ,मैक्रोनी और मैगी का वो ज़माना  लोहड़ी मनाना ,वो बी ० टेक ० की लड़कियों के साथ यादगार पल ,उनमें से एक  यादगार पल है ,दो लड़कियां  एक को पकड़ के बाथरूम में फ़ेंक आती थी 😂😂 वो थी शैतानो की नानियाँ ,इतनी ज़ोर से दौड़ती थी लगता था भूकंप आ गया ,शुरू में हमे बहुत  गुस्सा आता था पर बाद में हम भी उन्हीं में  शामिल हो गए , और यही मुझे मिली मेरी स्कूल की दोस्त तो फिर जान पहचान और बढ़ गयी।
वो शाम की चाय के बाद घूमना ,और क्रश के नाम से एक दूसरे को चिढ़ाना और फिर हमारे सब-जूनियर्स का आना और फिर कुछ ही दिन के  मेहमान  होने का एहसास होना और पुराने बी ० टेक ० फाइनल का जाना और नया फाइनल का आना और वो  रात को घूम के चेक करना की किस के रूम की लाइट  जल रही है कौन पढ़ रहा है और फिर खुद सो जाना😂😂😂😂 ,वो एग्जाम के एक दिन पहले बर्थडे मनाना  और  वो लड़कियों के फुल वॉल्यूम में बजते गानों के बीच उन्हें दुआएं  देते हुए पढ़ने की कोशिश करना 😂😂😂😂 हमने सबको बहुत दुआएं दी हैं खासकर अपने टीचर्स को और नामकरण भी  किये और मेरा जो दुआ प्रोग्राम शुरू होता था वो ब्रश  करने से रात को सोने तक शुरू रहता था 😂😂😂😂
वो हमारा मोबाइल कंप्यूटिंग के एग्जाम  की सुबह एक के रूम में इकठ्ठे  हो कर आंसू बहाना 😂😂😂😂
 वो हर एग्जाम के बाद दुनागिरि जाना और अगले सेम में शुरू दिन से पढाई करने की प्रतिज्ञा लेना और फिर से वही ढाक के तीन पात हो जाना ,और हमारे फाइनल ईयर तक सेवी भी खुल गया था  हमारे हॉस्टल में ,तो हमने सेवी का भी आनंद उठा ही लिया आने से पहले।
वो फेयरवेल की तैयारी ,वो फेयरवेल में हमारा धमाल  और वो गाना "पल ये हैं प्यार के पल "और सीनियर्स और बी ० टेक ० गर्ल्स की डायरी लिखते लिखते कब अपनी डायरी लिखवाने का टाइम आ गया पता ही नहीं चला ,और मैंने वो हर एक डायरी अभी  सम्हाल के रखी है ,क्योंकी ये सिर्फ डायरी नहीं ,यादें हैं  ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत  लम्हों  की जो फिर कभी वापिस   नहीं आते तो अगर आप पास आउट हैं तो  उठाइये अपनी डायरी और घूम आइये फिर से एक बार अपने प्यारे कॉलेज और अगर आप अभी पढ़ रहे हैं तो  खुल के एक एक पल का आनंद लीजिये क्योंकि ज़िन्दगी ये  पल फिर नहीं दोहराएगी और रह जाएँगी बस यादें  और नम्बर्स जो अब कभी मिलते नहीं क्योंकि सब बिजी हैं  व्हाट्सप्प है ,तो जो डायरी में कीप इन कांटेक्ट लिखा जाता है वो कभी फिर होता नहीं ,पर कुछ अच्छे दोस्त भी बनते हैं जो हमेशा साथ रहते हैं और बाकियों की होती हैं तो बस यादें।

Monday, April 13, 2020

कुमाऊँ की थाली से


कुमाऊँ  की थाली से मैं आज आपके लिए लायी हूँ भट्ट के डुबके ,ये उत्तराखंड में कुमाऊं का  पारम्परिक भोजन है और चावल के साथ खाया जाता है ,इसकी रेसिपी मैं इसलिए लायी हूँ क्योंकि जब भी मैंने इसकी रेसिपी ऑनलाइन ढूंढने की कोशिश की ,ये मुझे कहीं पर नहीं मिली ,इसलिए जब भी कोई उत्तराखंड की इस डिश को   बनाना चाहे तो वो आसानी से इसे ढूंढ पाए।
इसे मैं लायी हूँ अपनी मौसी की रसोई से सीधे आपके लिए।
सामग्री :
भट्ट की दाल : एक कटोरी
चावल : चार चम्मच
जम्बू : ये पहाड़ी जड़ी होती है ,जिसका इस्तेमाल तड़के के लिए होता है
गदरेड़ी : ये पहाड़ी जड़ी होती है ,जिसका एक टुकड़ा हम ले सकते हैं
लहसुन : एक गाँठ
हींग : एक चुटकी
नमक ,मिर्च स्वादानुसार
बनाने का तरीका :
सबसे पहले भट्ट की दाल को चावल के साथ धो कर रात भर के लिए भिगोने डाल दें और सुबह मिक्सी में या सिल बट्टे पर भिगाये हुए दाल चावल , लहसुन,गदरेड़ी और मिर्च डाल के पीस लीजिये।
नोट:सिल बट्टे में पीसेंगे तो ज़्यादा स्वादिष्ट बनेगीऔर आप पिसी हुई मिर्च भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
लोहे की कढ़ाही में तेल गरम करें और उसमें हींग का और जम्बू का तड़का लगाए और पिसी हुई दाल को कढ़ाही में डाल दें  और थोड़ा पतला होने तक पानी मिला दें  और स्वादनुसार नमक मिलाये और धीमी आंच पर पकने के लिए छोड़ दीजिये और तब तक पकाएं जब तक उसमें बुलबुले बनने बंद हो जाये और डुबको के छींटे बाहर निकलना शुरू हो जाये। अब चावल के साथ इसे परोसिये ,खुद भी खाइये और औरों  खिलाइये।
इसमें  जो गाँठ   है वो गदरेड़ी हैंऔर दूसरी  जम्बू है। 


भट्ट की दाल 
धन्यवाद। 

Saturday, April 11, 2020

गंगोत्री गर्ल्स होस्टल @KEC द्वाराहाट अल्मोड़ा

 गंगोत्री आप शायद समझ नहीं पाए होंगे की ये अल्मोड़ा में कैसे आ गया  ,तो सबसे पहले मैं आपको बताना चाहूंगी कि ये कुमाऊं इंजीनियरिंग कॉलेज द्वाराहाट अल्मोड़ा के गर्ल्स होस्टल का  नाम है।
तो ये तो हुआ आपका परिचय ,जब हम कॉलेज में पढ़ रहे थे तब दो ही होस्टल्स हुआ करते थे ,बाद में और भी नए होस्टल्स बन रहे थे तब हम पास आउट हो चुके थे।
तो शुरू करते हैं ,कुमाऊं इंजीनियरिंग  कॉलेज द्वाराहाट ,जो अल्मोड़ा से कुछ 35 किमी दूर है और बहुत ही भव्य और सुन्दर इसका परिसर है ,खासकर एडमिन ब्लॉक ,हमारे समय में दो ही कोर्स थे बी० टेक ० और एम० सी ० ए ० ,हमें सुअवसर मिला एम० सी ० ए ० में पढ़ने का ,क्योंकि शौक था सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने का।
 हमें पहले साल सौभाग्य मिला गंगोत्री में रहने का ,फर्स्ट ईयर बी० टेक ० और एम० सी ० ए ० दोनों वही ठूंसे जाते थे ,बस शुरू हुआ कॉलेज  का सफ़र और उससे भी यादगार हॉस्टल का सफ़र ,हम पांच लड़कियां थी हमारे कोर्स में बाकि लड़के थे ,तो यही से शुरू हुआ हॉस्टल का सफ़र जहाँ एक रूम में तीन लड़कियां होती थी ,पहले कुछ मेलमिलाप फिर  घरवालों से फ़ोन पर बात करने के लिए खिड़कियों पर लटकना या फिर थैलियों को खिड़की में टांग कर उसमे फ़ोन रखकर हैडफ़ोन से घरवालों से बात करना और वो हच के सिग्नल जो ढूंढने पड़ते थे ,खैर  हम उन्हें ढूंढ ही लेते थे ,और रात को वाशरूम अकेले जाने में डरना और सबका मज़ाक उड़ाना।
मामू की मेस और मेस वाले भैय्या लोग ,और वो मेस में लगा एक्वा गार्ड का पानी सब कमाल था और आखिरकार हमारे सीनियर्स ने हमें दर्शन दिए ,यहाँ पर मैं आपको बताना चाहूंगी की हमारे सीनियर्स और सुपर सीनियर्स (मैम्स ) सब बहुत प्यारी थी पर कानून तो कानून होता है तो रैगिंग तो लेनी थी पर बहुत ही हैल्दी रैगिंग थी और मुझे बहुत मज़े आये और शुरू हुए नियम तेल लगी चोटी,फ्लैट चप्पल ,पिन अप दुपट्टा और सीनियर्स को उनकी चप्पलों से पहचानने का सिलसिला,और आँखें झुकाने का  ,और एक चीज़ जो बहुत अच्छी थी कि  हमारे सीनियर्स हमें कहीं भी हो  साथ जाने को बोलते थे ,वो बायोडाटा, जाने कितने बनाये होंगे ,पर पहली बार लिखने में मज़ा आया था और बाद में पूछिए मत ,सीनियर्स का रूम पर आना और फिर शुरू होता था हमारा डांस सेशन और गाना ,और इंट्रो और इन सब में उस नए माहौल में ढलने के लिए हमारी मदद करने वाली हमारी सीनियर्स ही थीं और पाँचों ही बहुत प्यारी थी ,एक नटखट और  चुलबुली ,एक बहुत खूबसूरत ,और दूसरी दबंग और एक मेरे ही जैसी और एक पढ़ाकू,ये थी हमारी सीनियर्स और हमने इनके चेहरे फ्रेशर्स के बाद ही देखे थे पर हम छुप छुपा के मैम्स को देख ही लिया करते थे और उनकी चप्पलों के रंग से लेकर उनका बायोडाटा सब याद करवाया गया था हमें ,तो फिर थे हमारे सुपर सीनियर्स ,उनमें चार मैम्स  थी और वहां तो हमने ग़ज़लों पर भी डांस किया था ,होश वालो को खबर क्या ,पहले जब ये गाना  सुनते थे तब पता नहीं था कि कभी इस पर डांस भी करना होगा पर रैगिंग में भी हमें बहुत मज़ा आया और फिर फ्रेशर्स के बाद हम आज़ाद थे पर अभी भी हमने साथ ही जाना होता था और हम पांचो ने पहाड़ भी एक साथ ही छान मारे  और फिर एग्जाम और वो रातों को जागना और 2 बजे रात को वो मैगी और कॉफी का बनाना और फिर बर्तन कौन धोएगा उसके लिए महाभारत ये बात और है कि बर्तन दो ही थे पर फिर  भी लड़ाई ज़रूरी थी।
और यहाँ पर मैं बी ० टेक ० फर्स्ट ईयर को भी आपसे मिलवाना चाहूंगी जिनसे हमारी रैगिंग के दौरान दोस्ती हुई थी  ,उस समय आपको हॉस्टल में रात को दो बजे बाल धोती लड़कियां मिल जाएँगी क्योंकि सुबह बिना तेल के बाहर  नहीं जा सकते थे।
हॉस्टल में सुबह ही बाल्टी बाथरूम में लगा कर  घेर लिया जाता था ,ये भी एक बहुत मेहनत का काम होता था ,कभी  कभी इस पर भी जंग छिड़ती थी ,कपड़े धोना भी एक बहुत बड़ा काम था और जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद था ,वो था चाय का समय जब पाँचों साथ बैठकर गप्पे लगाते थे ,मिमक्री करते थे और कॉलेज में हुई एक एक बात का बाल की खाल निकालने तक परीक्षण होता था और  वो असाइनमेंट्स ,तब हमारे नए टीचर्स आये थे  ,जो हमे असाइनमेंट्स पर असाइनमेंट्स देते रहते थे और हम बहुत परेशान ,और आज हमें ये समझ नहीं आता कि टीचर्स ने हमको ज़्यादा परेशान किया या हमने उनको 😂हमारे टीचर्स होटल के ही कैंपस में रहते थे और हम उनके दिखते ही छुपने के लिए तैयार रहते थे ,यहाँ पर मैं कहना चाहूंगी की हमारे सभी टीचर्स बहुत अच्छे थे और जो असाइनमेंट पे असाइनमेंट देते थे तो हम भी तैयार रहते थे ,एक मास्टर कॉपी बनती थी और हॉस्टल में छपाई शुरू ,वैसे हम उसे वहां टीपना कहते थे 😂 और यहाँ पर बातों ही बातों में मैं आपको गंगोत्री के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य से मिलाना भूल ही गयी ,जो थे हमारे प्यारे पप्पू जी।
ये पप्पू जी एक तरह का कीड़ा हुआ करते थे ,लाल और काली धारियों वाले और जिसे भी ये  बाइट देते थे वह  स्थिति भयावह होती थी तो कोशिश रहती थी की पप्पू जी से बच के रहा जाये और न ही हमें ये सुअवसर प्राप्त हुआ।
हॉस्टल का जो मुख्य भाग था वो था कॉरिडोर जहाँ पर आपको बेसुरा गाना गाती हुई,कभी फोन पर बिजी तो कभी पढ़ती हुई लड़कियाँ मिल जाएँगी और एक होता था कॉमन रूम जहाँ आपको टीवी के रिमोट के लिए झगड़ती लड़किया भी मिल जाएँगी और फिर एक नाम सुनने में आया ,पहले तो समझ ही नहीं आया कि है कौन ?फिर बाद में पता लगा वो थी हमारी हॉस्टल वार्डन ,नाम मैं यहाँ पर नहीं लूंगी पर है वो वैसी ही थी जैसा सुना था। वो सुबह दूसरे के गिलास चुरा के उसमें चाय लाना और जूठा गिलास उसी के कमरे में रख आना और फिर वो नोंक झोंक ,वो एक दूसरे के कपड़े पहनना और अपने कपङे न मिलने पर दोस्तों की अलमारी में ढूंढना ,वो पानी भर के रखना और एक मग्गा पानी लेने के लिए भी लड़ जाना ,वो सिंटिला की मस्ती और आरोहण का खुमार, वो सी ० एच ० सी ० की यादें ,वो सबका एक के बीमार पड़ने पर एक दूसरे की देखभाल करना।
वो छत पर लेट कर तारों को देखना ,वो घर से आती कचौरियां और रसगुल्ले और मक्के दी रोटी  और सरसो दा  साग जो सब   खाते थे सिवाय उसके जो लाता था ,यहाँ पर मैं आपको "पकवान" से मिलवाना चाहूंगी जिसे हमारी प्रिय सहेली लायी थी पर ये और बात हैं की मुझे आज तक समझ नहीं आया की उसे पकवान कहते क्यों हैं ,क्योंकि नाम सुनते ही बड़ी आशायें  जाग जाती हैं 😂
लिखने को बहुत कुछ है ,पर तीन साल एक पन्ने पर लिखना मुश्किल है ,अगर आप चाहेंगे तो यमुनोत्री पर भी प्रकाश डाला जायेगा ,पसंद आये तो प्लीज कमेंट और  फॉलो करें।

धन्यवाद्।

Friday, April 10, 2020

लॉक डाउन का सदुपयोग

आज के समय में  पूरा विश्व लॉक डाउन में जी रहा है और ये  समय जो हमें मिल रहा है ये हम सभी के  लिए एक अच्छा अवसर साबित हो सकता है ,अगर इसका सदुपयोग किया जाये ,तो आइये जानते हैं कुछ तरीके  लॉक डाउन को सदुपयोगी  बनाने के -
  •  अच्छे दिन की शुरुआत   के लिए छत पर या घर के आँगन में ही टहल लीजिये ,सुबह  की धूप से थोड़ी गर्माहट  लीजिये जो  आपके शरीर में विटामिन -डी की कमी पूरी करेगा ,क्योंकि गर्मियों  ने दस्तक दे दी है ,तो सुबह  का समय उपयुक्त है। 
  • सुबह की चाय  के साथ अपनी पसंदीदा किताब के  कुछ पन्ने  पलट लीजिये ,कोई मोटिवेशनल किताब ,जो आपको ज़िन्दगी से मिलवा दे। 
  • खाने  में कुछ नया बनाने की कोशिश कीजिये ,पौष्टिक और घर का बना खाइये ,क्योंकि  जो चीज़े हम बाजार से लेकर खाते है वो घर पर भी बनायीं  जा सकती है ये बात लॉक डाउन ने ही बताई है। 
  • अपना पसंदीदा काम कीजिये ,अगर आपको लिखना पसंद  हो तो खेलियें विचारों से शब्दों के साथ  ,पेंटिंग  पसंद हैं तो भर लीजिये रंगो को  अपनी ज़िन्दगी में ,डांस पसंद  है तो  थिरक लीजिये समय की धुन पर  या कुछ और। 
  • अपनी  कमज़ोरी पर काम कीजिये ,और उसमें निपुण  हो जाइये  और  उसे अपनी ताकत बना लीजिये। 
  • कोई एक नयी चीज़ सीखिए ,जो आप कभी सीखना चाहते  हो  पर सीख   न पाए हो ,तो लॉक  डाउन का भरपूर फायदा उठायें और इंटरनेट पर उपलब्ध साधनों  से सीख लीजिये। 
  • परिवार के साथ समय बिताएं और मिलजुल कर एक दूसरे का सहयोग कीजिये ,जिससे की आप परिवार के साथ समय भी बिता पाएंगे और सम्बन्ध भी मधुर हो जायेंगे,मैं अपनी कहूं तो ,मैं अपने पति के भरपूर सहयोग के कारण ही अपना ब्लॉग लिख पा रही रही हूँ। 
  • शाम के समय घूमे ज़रूर ,आपको आजकल सभी लोग छत पर ही मिलेंगे ,कुछ पतंग उड़ाते , कहीं छत पर घूमते लोग ,कुछ गपियाते ,आपके अपने जैसे लोग। 
  • सबसे ज़रूरी अच्छी नींद लीजिये और ऊपरवाले का धन्यवाद् कीजिये कि हम स्वस्थ हैं,खुश हैं। 
लॉक डाउन का सदुपयोग कीजिये और घर पर रहिये ,सुरक्षित रहिये ,देश  सहयोग करें। 
धन्यवाद। 

Thursday, April 9, 2020

मन के हारे हार है ,मन के जीते जीत।

 मन के   हारे  हार है ,मन के जीते जीत ,ये मैंने लगान फिल्म में सुना था और बस तब से इसे अपना लिया ,पर क्या ये सच है और क्या ऐसा होता है ?
ज़िन्दगी में कभी कभी ऐसा समय आता है ,जब आप खुद से ही हार जाते हैं ,शायद औरों से आप लड़ भी लें  और जीत भी जाए पर जहाँ पर आप खुद को खो देते हैं तब स्थिति बहुत मुश्किल हो जाती हैं कि खुद को कैसे संभाले या खुद को वापिस कैसे पाएं ,किसी और को ढूंढना आसान है ,जब आप खुद ही खो जाओ ,दूर हो जाएँ अपने आप से तो फिर कैसे वापिस लाया जाये ?
बहुत बार ऐसा समय आता है जब सुबह आपके लिए कोई नया दिन नहीं लाती ,मन यही कहता है कि काश सुबह ही न हो ,दो तरह से आप जूझ रहे होते हैं,एक खुद को वापिस पाने के लिए और दूसरा दुनियां  की बातों से और उन अपेक्षाओं से जो आपको थी कभी खुद से और आपके परिवार को आपसे ,पर इस परिस्थिति को समझना और इससे गुज़रना दोनों बहुत अलग बातें हैं ,क्योंकि बिना इस रास्ते पर चले हुए आप इस सफर को नहीं समझ सकते ,सफर एक एकांत का ,दूर दूर तक छाये अँधेरे का और बिना मंज़िल के एक कभी न ख़त्म होता लगता ये रास्ता शायद जिसमें आप हमेशा के लिए खो जायेंगे पर क्या हमें खुद को ऐसे ही छोड़ देना चाहिए या कोशिश करनी चाहिए खुद को ढूंढने की ?
हो सकता हैं कभी आपको इस अँधेरे से निकालने कोई देवदूत आ जाये  ,वो कोई भी हो सकता है ,आपका प्यारा दोस्त या  परिवार   ,मेरे साथ मेरी सबसे प्यारी दोस्त थी ,और मैं आज भी उसकी शुक्रगुज़ार हूँ कि  वो मेरे  मुश्किल समय से मुझे निकाल लायी ,पर ऐसा हमेशा नहीं होता ,कभी आप के साथ कोई नहीं होता ,और आप बिल्कुल अकेले होते हो ,तब आपके सामने केवल दो ही विकल्प बचते हैं कि या तो परिस्थितियों के सामने घुटने टेक दिए जाए या फिर आप अपना परचम फ़हरा दिया जाये  और जहाँ तक है सभी की  यही राय होगी की आप जीत जाए।
 कठिन समय शुरू हो जाता है वहाँ से ,जहाँ पर कोशिशें होती हैं ,दूसरों को खुश करने की हर हाल में ,जहाँ पर  उम्मीदें खुद की बजाय दूसरों से लग जाती हैं ,और  शुरू करते हैं खुद को दूसरो की नज़रों से देखना ,तौलते रहते हैं खुद को दूसरों के बनाये मापदंडो के आधार पर ,खुद को अनदेखा कर अनगिनत कोशिशें करना  और इस पूरे दृश्य में "मैं " कहीं खो जाता है और फिर से टूटने लगते हैं ,आत्मसम्मान को पहुँचायी गयी चोट से ,मनोबल को तोड़ने की अनगिनत कोशिशों से ,क्योंकि यही वो पूरा परिदृश्य है ,जिसमें न चाहते हुए भी आप अपनी खुशियों की ज़िम्मेदारी दूसरों को सौंप देते हैं,और उम्मीद करते हैं बदले में उन्ही खुशियों की और जब नहीं पाते हैं तो आप टूटना शुरू हो जाते हैं ,यहाँ पर ज़रूरत हैं खुद को ढूंढने की ,दूसरों से उम्मीद लगाने से अच्छा है वो उम्मीदें आप खुद से लगएँ  ,और कोशिश कीजिये उन्हें पूरा करने की ,सिर्फ अपने लिए ,और झोंक दीजिये खुद को उसे पूरा करने की राह में ,भले ही आप कामयाब हो या न हो पर अपनी उम्मीदों और सपनों  की तरफ आपका बढ़ाया एक कदम भी आपको ख़ुशी से भर देगा।
ढूंढ लाइए खुद को ,पहचानिये खुद को,ढूंढिए कुछ सवालों के जवाब कि आप क्या चाहते हैं ,सिर्फ आप क्या चाहते हैं और निकल जाइये  इस सफर पर अकेले ही अपने साथ  पाने वही जो आप चाहते हैं ,बिना  ये सोचे की कोई क्या सोचेगा और ढूंढ लीजिये अपनी खुशियां खुद ही ,क्योंकि खुशियां कहीं नहीं खोती बस आप खो देते हैं खुद को ,तो पा लीजिये अपनी खुशियों को।
कभी अपनी किसी किताब को पूरा करने का जश्न मना लीजिये तो कभी उगते सूरज की लाली अपने होंठो पे सजा लीजिये और मुस्कुराते रहिये और धन्यवाद कीजिये उस उपरवाले का जो हमेशा आपके साथ है।
 चटक धूप में जब कभी  ठंडी हवा का एक झोंका आपको सहला जाये  तो महसूस कर लीजिये उन अपनों को जो आपसे बहुत दूर जा चुके हैं ,उनके प्यार को जो वो आज भी आपको भेज रहे हैं।
जुड़ जाइये सकारात्मक और ज़िंदादिल लोगो से ,कुछ बातें अगर आप नहीं भूल पा रहे हैं और जो आपको परेशान करती रहती हैं ,यकीं मानिये मुश्किल नहीं है भूलना और मत कीजिये एक भी कोशिश उन्हें भुलाने की बस बदल लीजिए अपने सोचने का तरीका ,प्रेरणा लेना शुरू कीजिये उन बातों से ,आंकलन  कीजिये दूसरों  का नहीं अपने आप का ,स्वीकार कीजिये गलतियां जो आप से हुई हैं दूसरों  को खुश करने की चाह में और सुधार लीजिये उन गलतियों को ,और सबक लीजिये ज़िन्दगी से जो वो आपको सिखाती है ,कभी न दोहराने की उन गलतियों को फिर से और उभर जाइये हर उस बात से जो अभी तक आपको दुखी करती है और शुरू कीजिये ज़िन्दगी को खुद के लिए जीना ,खुश होना।
तैयार कीजिये अपने अंदर एक ऐसा योद्धा जो तैयार है ,सभी नकारात्मक विचारों को,बातों को प्रेरणा में बदलकर आगे बढ़ने के लिए ,और सकारात्मकता को अपने विचार और व्यवहार में भरने के लिए , प्रयासरत रहिये खुद को बेहतर बनाने के लिए ,और बन जाइये वही जो आप बनना चाहते हैं।
तोड़ दीजिये हर उस सोच को जो आपके विचारों को बेड़ियों से बांधे  हुई है ,छोड़ दीजिये दूसरों की परवाह करना  और वही कीजिये जो आपको सही लगता हैं ,खुद को आज़ाद कर लीजिये हर पैमाने से जो मापता हो आपके हंसने के तरीके को ,बात करने के लहजे को  या फिर आपके हर अंदाज़ को ,क्योंकि आप कैसे जीना चाहते हैं ये आपका फैसला होना चाहिए न कि  दूसरों   का।
कोई फर्क नहीं पड़ता की आप आज किन ऊंचाइयों को छू  रहे हैं या छूना चाहते हैं ,फर्क बस इतना है कि क्या आप  ये सब कुछ पाकर खुश है ,क्योंकि ज़िन्दगी एक ही बार मिलती है और ये हम सबने बहुत बार सुना है और शायद कहा भी होगा ,तो मन में ठान लीजिये कि चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हो ,"मन के हारे हार है,मन के जीते जीत "  और फहरा दीजिये परचम अपनी खुशियों का ,जीने के अंदाज़ का और भर दीजिये सभी को अपनी सकारात्मकता से ,खुशियों से।
धन्यवाद।

Monday, April 6, 2020

मेरे शहर में

चलिए ले चलूं  आपको अपने शहर अल्मोड़ा ,नैनीताल से कुछ 60 किमी की दूरी पर ,खुद में समेटे हुए जाने कितने वंशो की ,राजाओं की  गाथायें स्वतंत्रता संग्राम से लेकर अब तक की निशानियां संजोये हुए।
समय बदलता रहा पर नहीं बदला  है मेरा शहर ,जहाँ खेलता है हमारा बचपन ,जवान होते हमारे सपने और अपनी लड़कियों की विदाई के बाद भी दिल खोल के स्वागत करता और नए लोगो को अपने रंग में रंगने वाला हमारा अल्मोड़ा।
ऊँचे ऊँचे पहाड़ों के बीच से झांकता कुनमुनाता सा  सूरज जब अपनी गेरुई रंगत बिखेरता हैं तभी वो छप जाती है  माँ के चूल्हों में ,  बिखर जाती है घरों की धेलियों के  ऐपण  में ,और यहाँ की ब्वारियों के माथे के सिन्दूर में ,और फिर शुरू हो जाता है मंदिरो में घंटियों का और मस्जिदों में अज़ान का मधुर संगीत  ,यहाँ  की  सुबह ऐसे ही शुरू होती हैं ,फिर शुरू होती है ज़िन्दगी जीने के लिए जद्दोजेहद ,स्कूल को जाते बच्चे ,दफ्तर जाते लोग ,सफाई के बाद खुलती हुई यहाँ  की बाज़ार, बाज़ार ज़्यादा बड़ी नहीं पर शुरू हो जाती है धारानौला बस स्टैंड से और ख़त्म  होती है हुक्का क्लब पर। 
यहाँ आपको मिल जाएगी धारानौला बाज़ार ,जहाँ से गुज़रते आपको मिलेगी बावन सीढ़ी और वहां से तीन रास्ते ,एक मेरे स्कूल को एडम्स गर्ल्स इंटर  कॉलेज को ,दूसरा नंदा देवी बाज़ार  को और तीसरा लाला बाज़ार को ,लाला बाज़ार में आपको मेडिकल स्टोर ,कपड़ों की दुकानें ,कॉस्मेटिक और सुमंगलम और साह होटल मिल जायेगा  जहाँ बच्चे अपने माता पिता का हाथ थामे खरीददारी के बाद  समोसे और लस्सी से थकान मिटाने के लिए बैठते हैं ,हो सकता है कि समय के साथ मेनू बदल गया हो पर मुझे यही याद है,सुमंगलम के मोमो चाऊमिन सब आपको बहुत पसंद आएंगेऔर यहीं पर हैं अल्मोड़ा का शायद सबसे पुराना स्कूल ,रैम्से स्कूल  जो कुमाऊं के अंग्रेज़ कमिश्नर हैनरी  रैम्से के नाम पर है  और यहीं  पर सारी प्रदशनियाँ लगायी जाती है। 
पहले यहाँ की बाज़ार पटाल की होती थी ,पर बाद में उन पटालों में बारिश के समय पानी भर जाता था तो इसलिए अब उन पटालों की जगह आधुनिक टाइलों ने ले ली है पर खूबसूरती वहीं  बरक़रार है ,आगे चलने पर आपको नन्दादेवी बाज़ार मिलेगी जहाँ हैं जोगा लाल साह की दुकान और उनकी प्रसिद्ध और मुँह में पिघलती गुजिया अगर आपने अभी तक नहीं खायी है तो ज़रूर खाइयेगा , आगे बढ़ने पर नंदादेवी का मंदिर है और यहीं लगता है ,अल्मोड़ा का भव्य और सुप्रसिद्ध नन्दादेवी का मेला ,जहाँ आपको पूजा करती माओं और झूला झूलते ,बाजा बजाते बच्चों में अपना बचपन फिर से मिल जायेगा ,अपने बुबु का हाथ पकड़े बच्चे और उन बूढ़ी  हो चुकी आँखों में शायद फिर आपको अपने बुबु मिल जाये और विदा होती नंदादेवी  में  शायद आपको  यहाँ की बेटियों  की भीगी आँखे मिल जाये ,यहाँ से आगे  चलने पर आपको मिलन चौक मिलेगा और वहीं  पर मिलेगा आपको भगवान बुक डिपो और अशोका होटल और किताबें खरीदते कुछ बच्चे ,यहाँ पर  शनि देव का मंदिर है जहाँ हर शनिवार लोग  सुबह अँधेरे में पूजा करने जाते हैं और शाम भी  ,और भी बहुत लोग होते थे ,यहाँ से फिर ऊपर को बढ़ते हुए जागनाथ टॉकीज़ होता था कभी जहाँ अब विशाल मेगामार्ट है  फिर मेरा स्कूल। 
तो चलिए  अब चलते हैं लाला बाज़ार की तरफ जहाँ आपको मिल जायेगा  लोहे का शेर ,पहले ये इतना रंगीन नहीं था जितना अब इसे सजा दिया गया  है और अब आप आसानी से इसे ढूंढ सकते है,जब फ़ोन नहीं थे तब लोग यहीं पर एक दूसरे का इंतज़ार करते थे ,आगे आता है  अल्मोड़ा अस्पताल और कई मेडिकल स्टोर ,और सबसे पुराना  दुमंजिला  स्टोर उसका असली नाम मुझे नहीं पता ,जब से होश सम्हाला है तब से यही सुनती आयी हूँ और वहीं कहीं  पर मिल जायेंगे दिलबहार छोले की अपनी  छोटी सी  दुकान गले में लिए घूमते  छोले वाले अंकल ,जिसका स्वाद आपको वापिस अंकल को ढूंढने पर मजबूर कर देगा और यहीं से आगे दो रास्ते हैं ,एक बस स्टैंड की तरफ और दूसरा कचहरी  बाज़ार  की तरफ ,तो पहले बाज़ार घूम लेते हैं यहाँ पर भी आपको बहुत दुकाने मिल जाएँगी बाकि शहरों की ही तरह पर नहीं मिलेंगी तो ज़मीं में लगी दुकानें ,जहाँ  आपको मिलेंगे पहाड़ी जड़ीबूटियां जैसे बालछड़ी बालों के लिए ,और जम्बू-गदरेड़ी यहाँ के पहाड़ी खाने में तड़का लगाने के  लिए और भी बहुत कुछ और आगे बढ़ते हुए आपको मिलेगी सबसे पुरानी अनोखे लाल की बर्तनों  की दुकान और राजहंस फोटो स्टूडियो और बहुत सारे ब्यूटी पार्लर, जिनमें मेरे पसंदीदा रोज़ी अंकल जो शादी के इतना साल बाद भी शहर की बेटियों को नहीं भूले और वापिस अल्मोड़ा जाने पर अपनेपन  का एहसास करवा देते हैं , और सबसे पुरानी और मशहूर सलीम अंकल  की जूतों की दुकान ,अब भले ही हम कितने ही बड़े शोरूम से कितने भी बड़े ब्रांड के जूते  पहन ले पर यहाँ के जूतों को पहनने और खरीदने में जो ख़ुशी होती थी वो कहीं नहीं और यही से ठीक ऊपर रास्ता जाता है कचहरी को जो कभी फोर्ट मेयरा या लाल मंडी का किला कहलाता था । 
 आगे चलने पर आपको रघुनाथ मंदिर मिलेगा,जहाँ पर आपको भक्त और मंदिर से सटी दुकान में कुमाउँनी ऐपढ़  से सजी चौकियां  और बहुत सारी  चीज़े मिलेंगी जिन्हे आप खरीद सकते हैं अल्मोड़ा की निशानी के रूप में और यहाँ का रंगवाली पिछोड़ा  भी सबसे अलग है जो सभी शुभ कामों में महिलाएं पहना करती हैं।  
आगे आपको मिलेंगे  बाजार से सटे खूबसूरत घर जो अल्मोड़ा की प्राचीनता का अहसास करवाते हैं ,बस आप चलते जाइये और  बाज़ार भी साथ चलती  जाएगी ,यहाँ घूमते हुए लोगो में शायद आपको कभी कोई अपना मिल जाये या आप खुद  को ही ढूंढ ले कभी कॉलेज या स्कूल जाते बच्चो में या दोस्तों की टोलियों में  और चौधरी  चाट हॉउस ,जहाँ  गोलगप्पे ,सौंठ के बताशे और आलू की टिक्की जैसा स्वाद आपको  कहीं और नहीं मिल पायेगा  आगे आपको हुक्का क्लब मिलेगा और गलियों से नीचे जाने पर चौघानपाटा जहाँ आपको मिलेगा गाँधी पार्क ,बहुत पुराने डॉक्टर गुसाईं सिंह   और अल्मोड़ा बुक डिपो जहाँ  से हम सारी  प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म खरीदते थे ,तब ऑनलाइन फॉर्म नहीं हुआ करते थे और किताबे जो कहीं नहीं मिल पाती थी वो यहाँ मिल जाती थी।
यही पर सड़क से नीचे है पोस्ट ऑफिस और जी.आई. सी. ,आगे आपको ए.आई.सी भी मिलेगा ,बाकि बहुत से नए और प्राइवेट स्कूल भी खुल गए हैं ,जिनकी मुझे ज़्यादा जानकारी नहीं है  और कुछ दूरी पर आता है मेरा कॉलेज ,सोबन सिंह जीना परिसर अल्मोड़ा ,मैं यहाँ भी ले जाउंगी आपको पर अल्मोड़ा घुमाने के बाद  और हां ब्राइटन कार्नर ज़रूर जाइएगा और वहाँ का बर्गर ज़रूर खाइयेगा ,और  डूबता हुआ सूरज जब सोने  से पहले  पूरे आकाश को रंग जाये तब आप भी अपनी ज़िन्दगी में ये रंग भर लीजियेगा  और फिर निकल जाइएगा  अल्मोड़ा से मिलने ,तो चले फिर अब बस स्टैंड की तरफ पर वह जाने से पहले और भी सुरम्य जगह हैं जहाँ मैं आपको ले जाउंगी पर अगले ब्लॉग में ,तो अल्मोड़ा से जुड़ने के लिए मुझे फॉलो कीजिये और हाँ बस स्टैंड से बस पकड़ने से पहले खीम सिंह की दुकान से हमारे अल्मोड़े की बाल मिठाई ,सिंगौड़ी और चॉकलेट  अपने दोस्तों ,रिश्तेदारों के लिए ले जाना न भूले।
और आशीर्वाद लेने चितई मंदिर ,कसारदेवी ,कटारमल ,जागेश्वर और खगमरा ज़रूर जाएँ  और जो कुछ भी मैं नहीं लिख पायी हूँ वो मैं अपने अगले ब्लॉग में लिखूंगी।
कैसा लगा आपको मेरा शहर ज़रूर बताएं और जुड़े रहिये अल्मोड़ा के बाकि दर्शनीय स्थल घूमने के लिए मेरे साथ और तैयारी कीजिए अल्मोड़ा घूमने की अपने परिवार के साथ जब स्थिति अनुकूल हो जाये।








ये लेख मैं  अपने प्यारे बुबु (नानाजी ) स्व o श्री मंगू लाल जी को समर्पित करना चाहूंगी ,जिनकी वजह से मुझे अल्मोड़ा को अपना शहर कहने का  और यहाँ की मिट्टी से जुड़ने का मौका मिला।

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद,मेरा लेख पढ़ने के लिए ,कैसा लगा कमेंट बॉक्स में बतायें और  मेरे सभी पोस्ट तक पहुँचने के लिए मुझे फॉलो करना न भूले।







Saturday, April 4, 2020

मेरा स्कूल एडम्स गर्ल्स इंटर कॉलेज(part 2)

आइये चलते हैं मेरे स्कूल की सैर पर मेरे साथ ,कुछ पुरानी यादें ताज़ा करने ,हो सकता है इसमें आपको अपनी  भी मिल जाये।
मेरे  स्कूल  का कैंपस इतना भव्य और सुरम्य था कि अगर  आप सैर पर निकले तो आप यहाँ की  प्राकृतिक सुंदरता से अभिभूत हुए बिना रह नहीं पाएंगे ,बहुत ही खूबसूरत हमारा संगीत विभाग और विज्ञान विभाग ,हमारा मुख्य कैंपस ,चैपल हॉल , प्राइमरी स्कूल और चर्च और हमारे बहुत ही प्यारे टीचर्स और हम।
शुक्रवार को गाने की कॉपी ले जाना और भूल जाने पर दोस्तों का दो पन्ने  फाड़ कर कॉपी बनाने   मदद करवाना 😂 ,वो  हाथों  पर जॉली लगाना ,जॉली में  सारे दोस्त एक गोला बनाते थे  कलाई पर  और उसे इंक से या स्केच कलर से भरते रहते थे ,जिसकी जॉली सबसे पहले मिटती  थी वो हार जाता था और टॉफ़ी खिलाता था ,जॉली का खुमार इतना था कि हम घर पर भी उसमें रंग भरते रहते थे 😂
और हम अपनी टीचर्स की प्लेन साड़ी देखकर एक दूसरे के साथ ताली   बजाते थे की आज प्लेन साड़ी दिखी है और हम मीठा खाएंगे।
 हमारे स्कूल में सीनियर्स को दीदी कहते थे और जब भी १५ अगस्त या २६ जनवरी या फिर टीचर्स डे होता था तब हम उनकी प्रैक्टिस देखा करते थे ,१५ अगस्त की वो प्रभात फेरी और हमारे स्कूल की बालूशाही सब बहुत याद आता है।
हम चार दोस्त थे और सबसे धूर्त हम दोनों की जोड़ी ,अब उन चारो में से सिर्फ एक से ही संपर्क में हूँ जो मेरी जोड़ीदार थी और पक्की दोस्त थी 😂मेरे सभी अपराधों में बराबर की हिस्सेदार ,और आप यकीं नहीं मानेंगे हम दोनों को एक हमारी पिछलग्गू दोस्त ने श्राप भी दे दिया था हमसे परेशान होकर 😂
और एक मेरी बहुत प्यारी दोस्त थी बावन सीढ़ी के पास रहती थी वो अब भी संपर्क में है ,और एक थी हमारी अटल बिहारी जी की फैन और उनसे बहस करने में जो आनंद था वो कहीं नहीं ,दसवीं में एक सीधी  सी,प्यारी सी लड़की हमारे क्लास में आयी पर मैं उसे बहुत परेशान  करती थी पर प्यार से अगर वो इसे पढ़ रही हो तो मुझे माफ़ कर देना मेरी शरारतों के लिए।
 मैं थी सौरव  गांगुली की फैन तो जो भी उसकी फोटो आती थी अख़बार में वो मेरी डायरी में चिपकायी जाती थी  और स्कूल में हम सब गांगुली और द्रविड़ के पीछे लड़ते रहते थे।
मैं गुड़िया बनाती थी कॉपी पर ,एक दिन इंग्लिश की मैम ने देख लिया और फिर मुझे क्लास से बहार निकाल  दिया था ,उस समय मुझे बहुत बुरा लगा था पर आज ये यादें गुदगुदा जाती हैं।
हमारी सारी टीचर्स क्रिसमस पर  या स्वतंत्रता दिवस पर सफ़ेद साड़ी पहन कर आती थी और सब बहुत खूबसूरत लगती थीं।
दसवीं के बाद सारे दोस्त बिछड़ गए ,कोई स्कूल छोड़ के चला गया  ,कोई शहर और किसी के सब्जेक्ट अलग हो गए और हम रह गए ग्यारवीं  मैं अकेले ,सच उस समय हम चारों  की बहुत याद आती थी पर फिर नए दोस्त बनने शुरू हुए और मिली मुझे एक प्यारी सी दोस्त ,नटखट सी ,चुलबुली ,खुले आसमान में पंछी जैसे उड़ने वाली ,और बोलते बोलते कभी न थकने वाली,और दूसरी लाइन मैं चलती क्लास के बीचा खाना खाने वाली  और फिर दोस्त जुड़ते ही गए ,एक हमारी दिया मिर्ज़ा ,और कुछ फर्स्ट लाइन में बैठ कर सोने वाली , सोते हम भी थे पर हम दूसरी लाइन में  सोते थे ,पहला पीरियड था फिजिक्स का ,सर बहुत अच्छा पढ़ाते थे पर जाने कहाँ से इतनी नींद आती थी ,एक तो इतनी कर्मठ थी की वो पूरी क्लास  ध्यान से पढ़ती थी।
एक बार सर ने पीछे लाइन में सोती हुई लड़कियों को देखकर बोला था कि "हॉस्टल वाली लड़कियों का अच्छा हैं ,स्कूल आने से दो काम हो जाते है ,दोस्तों से मिलना जुलना और बैग उठाने से कंधे की एक्सरसाइज😂" ये बात आज भी  मुझे याद है और मैं ये लिखते हुए भी हंस  रही हूँ और सर ने एक बार दोलन का प्रैक्टिकल करवाते हुए बोला  था "लड़कियों ये दोलन है सावन का झूला नहीं 😂" हम तब भी बहुत हँसे थे और आज भी मुझे सच में अभी भी बहुत हंसी आ रही है।
अब चले रसायन विज्ञानं की तरफ तो वहाँ भी हमारी मैम बहुत ज़्यादा प्यारी थी ,और मुझसे तो यकीं मानिये एक भी केमिस्ट्री के प्रैक्टिकल का परिणाम नहीं आया ,हमारी लैब में हम आग ही लगाते रहते थे पर कुछ होनहार प्रैक्टिकल को सही अंजाम तक पहुंचा देते  थे पर हमसे न हो पाया न स्कूल में न कॉलेज में।
हमारा  तीसरा प्यारा सब्जेक्ट गणित ,हम अपने स्कूल का पहला गणित का बैच थे ,और यहाँ आयी थी हमारी प्यारी और मेरी फेवरिट  टीचर ,जो हमें गणित पढाती थी उनके यहाँ हम ट्यूशन भी जाते थे और वह हम सबका ग्रुप बन गया था और हम जितने जितने भी थे सारे बहुत मज़े करते थे,वहां अंगूर तोड़ के खाना ,मैम  का प्यारा सा बेटा ,जिससे हम खेलते थे ,वो बहुत ही प्यारा लगता था हम सबको ,और यहाँ मुझे मिली मेरी सबसे प्यारी दोस्त जो तब जैसी थी आज   भी वैसी ही हैं ,हमेशा ,मेरे साथ ,जिसने मुझे हंसना  सिखाया और तब से आज तक वो हर कदम मेरे साथ चली है ,और आज भी मेरे साथ है ,ट्यूशन में और भी बहुत अच्छे दोस्त बने थे और उनमें से एक तो गायब ही हो गयी है हवा में महकने ,सचिन तेंदुलकर की फैन।
और हमारी हिंदी की क्लास और इंग्लिश की क्लास जहाँ हम सारे इकट्ठे होते थे।
इस सब में  मैं एक टीचर का नाम ज़रूर लेना चाहूंगी ,मेरी सब साथियों की चहेती हमारी "मिस मनोरमा जोशी ",वो सिर्फ एक नाम नहीं , एक आदर्श  शिक्षक की परिभाषा हैं ,वो जितनी खूबसूरत हैं  उससे कहीं ज़्यादा वो एक बहुत अच्छी इनसान हैं ,एक ऐसा शिक्षक जो शायद फिर कभी हमें मिल पाए ,उनकी क्लास का हमें बेसब्री  से इंतज़ार रहता था  और आज भी हम चाहते हैं कि शायद आप हमें कहीं मिल जाये और हम आपके पैर छू कर आपका आशीर्वाद ज़रूर लेना चाहेंगे ,शायद ही आप कभी इसे पढ़े पर ,मैं चाहती हूँ की आप इसे पढ़े और हम सभी की ओर से हमारा  ढेर सारा प्यार आप तक पहुंच पाये।
और अब चलते हैं आगे ,नहीं ज़्यादा नहीं क्योंकि हमारे किस्से कभी ख़तम नहीं होंगे पर शायद आप बोर न हो जाये ,अगर बोर हो तो हमारे स्कूल एक बार ज़रूर जाये,बहुत सारे खेल के मैदान भी मिलेंगे वहाँ आपको और मेरे जैसी बहुत सी छात्रायें होंगी जिनके अपने किस्से, अपनी  कहानियाँ होंगी  ,बहुत कुछ शायद मैं नहीं लिख पायी होंगी अगर आपको याद आये तो कमेंट बॉक्स में सब अपने अपने किस्से हम सबको बताये क्या पता उन किस्सों में हम भी शामिल हो।
लड़खड़ाते कदमों से जिस स्कूल में हम १२ साल पहले आये थे अब समय हो चुका था अलविदा लेने का और हमरा फेयरवेल भी आ गया था और फिर एग्जाम की टेंशन में हम रोना भूल गए पर आज मन बहुत  बहुत भारी सा लग रहा है ,जैसे कल से मैं अपना स्कूल पूरा घूम आयी थी और अब फिर से जैसे फेयरवेल आ  गयी है ,हम नहीं जाना चाहते पर आगे बढ़ने के लिए कुछ पीछे छोड़ना ही पड़ता हैं।
बस एक ही बात कहना चाहूंगी कि मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ कि मुझे एडम्स में पढ़ने का मौका मिला और आप लोगो का साथ मिला ,आज हम सब भले ही अलग अलग हो पर हम जुड़े हैं अपनी यादों से,फेसबुक पर,व्हाट्सप्प पर ,आइये फिर से जुड़ जाये अपने शहर से ,अपने स्कूल से ,अपने बचपन से,और चलिए अब वर्तमान में आया जाये ,परिवार भी देखना है 😂
अगर मैंने किसी की भी भावनाओं को ठेस पहुँचायी हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ।
आपको मेरा स्कूल कैसा लगा ज़रूर बताये और अपने विचार कमेंट करें।
धन्यवाद।

Friday, April 3, 2020

मेरा स्कूल एडम्स गर्ल्स इंटर कॉलेज(part 1)

मेरा शहर ,एक छोटा और प्यारा सा मेरा अल्मोड़ा ,मेरी यादों  का पिटारा जिसका नाम सुनते ही खुलने लगता है।
पहाड़ो से ,हरियाली से सजा हुआ मेरा अल्मोड़ा ,जहाँ बस अब मेरी यादें ही बसती हैं ,यादें जो शुरू होती  हैं  बचपन से  और  चल पड़ती हैं मेरे मन में बसने के लिए मेरी विदाई के साथ।
वो स्कूल का पहला दिन ,मेरा स्कूल एडम्स गर्ल्स इंटर  कॉलेज ,जो शहर से कुछ दूरी पर है,हरी भरी वादियों के बीच , घर से  स्कूल  तक का आधे घंटे का रास्ता जाने कितने अनजाने चेहरों से पहचान करवाता था ,वो सुबह की प्रार्थना और फिर शुरू होता था पढाई और दोस्ती का दौर ,स्कूल के कैंपस में वो आलू की चाट वाली आंटी  जो अपनी डलिया में हमारी खुशियों का खजाना लाती थीं ,कभी पत्तों पर तो कभी अखबार के टुकड़े में रखकर बेचा करती थी चटनी के साथ और आज भी वो स्वाद मेरे मुँह में ही हैं पर अब न वो आंटी हैं ही न ही उनकी खास चाट।
वो आखिरी पीरियड स्कूल का ,कभी हमारे टीचर हमें  सुला देते थे ,तो कभी कक्षा की मॉनिटर अंताक्षरी खिलवाती थी या फिर डांस होता था।
कभी ज़्यादा बोलने की और क्लास में शैतानी की सजा में सब हाथ ऊपर करके बाहर निकल दिए  जाते थे ,
सबसे अच्छा मुझे इंटरवल लगता था जब सब दोस्त मिल कर बैठते थे ,खेलते थे और  बेफिक्री से जीते थे।
वो सेक्शन का बदलना और दोस्तों का बिछड़ना और फिर से कुछ नए दोस्तों का ज़िन्दगी में प्रवेश होता था।
दोस्त भी कई प्रकार के होते थे ,स्कूल साथ जाने वाले दोस्त ,ट्यूशन वाले दोस्त,मोहल्ले के दोस्त और स्कूल के सबसे प्यारे दोस्त।
स्कूल के रास्ते में एक सफ़ेद दाढ़ी वाले अंकल की दुकान होती थी ,जहाँ से हम चापट ,ढूंढते रह जाओगे ,इमली के लड्डू ,स्वीट सुपारी और जाने क्या क्या खरीदते थे।
हमर चैपल हॉल जहाँ पर मुझे याद है कि  हमारी एक मिस ने एक लड़की के ज़्यादा बात करने पर उसके पेट पे छड़ी को घुमाया था और वो मुझे आज भी याद है और मैं अभी भी लिखते हुए हँस रही हूँ😆😆 ,क्या दिन थे वो भी ,जो कभी वापिस नहीं आ सकते और उन्हें एक पन्ने में नहीं उतारा जा सकता है।
वो प्रार्थना के समय और छुट्टी के  लाइन में लगना और सबसे छोटी लड़की का सबसे आगे लगना और हमारा अपने दोस्तों के साथ  लाइन में लगने के लिए अपनी लम्बाई को घटाना और बढ़ाना 😂 .
जब हम छोटी क्लास में थे तब दोस्ती थी और उससे ज़्यादा लड़ाई होती थी ,डेस्क के लिए जिसमें हम लक्ष्मण रेखा खींचा करते थे और फिर शुरू होती थी लड़ाइयां ,और  क्लास की खिड़की से हम आने जाने वाले लोगो को देखा करते थे और तरह तरह की बाते किया करते थे  😆😆 तब जब टीचर पढ़ा रही होती थी और हम बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोक पाते थे,क्लास मुझे याद नहीं,शायद नवीं  में  थे हम और हम दो दोस्त और वो तीन ,हम पांचो साथ बैठा करते थे अपनी अपनी लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल के अंदर पर वो लाइन भी ऐसी वैसी नहीं थी वो स्केल से एक एक इंच नाप के खींची गयी थी और ज़रा सा चूक हुई नहीं की फिर से युद्ध छिड़ जाता था और इसी बीच एक गर्दन से चेहरा निकल के मुस्कुराता रहता था और फिर उसपे भी बहुत बहस होती थी।
वो अगरबत्तियों के कवर से फूल काट कर उसमें सुंदर सा धागा लगा कर हमारा बुक मार्क   बनता था जो बड़ी ख़ुशी से हम अपने दोस्तों को दिखाया करते थे।
दसवीं में ट्यूशन के दोस्तों का भी अपना ही ग्रुप होता था ,जिनके साथ हम सुबह सुबह निकल पड़ते थे  पढ़ने और जाड़ो के दिनों में अँधेरे में डरते डरते  मंज़िल तक पहुंचते थे पर डर इंसानो का नहीं था क्युकी हमारे शहर में सब कुछ बहुत अच्छा था ,डर लगता था भूतो से ,कहीं अँधेरे में भूत आ गया तो क्या होगा और फिर शुरू हुआ हनुमान चालीसा और दुर्गा चालीसा को याद करने का जतन।
स्कूल से वापिस आते हुए,बावन सीढ़ी में , गर्मी के दिनों में  हम कभी कभी सोफ्टी भी खा लिया करते थे जिसे अब हम स्ट्रॉबेर्री कोन कहते हैं ,
वैसे वो बावन सीढ़ी कभी मैंने गिनी नहीं ,अगर किसी ने  गिनी हो तो बताइयेगा ज़रूर ,वहाँ  से घर तक का सफर हैं कूदते फांदते पार करते थे और रास्ते में खड़क भी खाते  थे जिसका पेड़ हमारे स्कूल के  रास्ते में हुआ  करता था और कभी हिसालु  और न जाने  कितने जंगली फल होते थे  जो हमने खाये अपने बचपन में।
और वो हरे पत्ते जिन्हें हम अपने हाथो पर छापा करते थे ,वो छपाई किसने सोचा था  की सीधे  दिल में ही छप जाएगी ,बाकि अगले भाग में,
और मेरी आदरणीय  टीचर्स और  जिन साथियों के  बारे में मैंने इसमें लिखा है  और  मुझसे  कुछ गलत लिख गया  हो तो  मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।

धन्यवाद


Thursday, April 2, 2020

खुद से प्यार की राह में

क्या कभी आपने खुद को शीशे में देखते हुए सोचा कि आप से ज़्यादा प्यारा  ऊपरवाले ने कुछ बनाया नहीं ?
एक बार मन में खुद से सच बोलिये , क्या कभी आपको लगा नहीं  कि  अपनी पसंद का कुछ किया जाये ,दुनिया को कुछ देर किनारे पर रखकर किनारा ढूंढ लिया जाये ?
अगर आपका जवाब नहीं है, तो एक बार खो  जाइये  भीड़ से ,और पा लीजिये   अपने आप को,जिसे आप भूल चुके है शायद ,कभी अपने सपनों  के पीछे भागते हुए या ज़िन्दगी जो जी रहे हैं उसमे खुद को भूलते हुए या फिर आसमान को  छूने  की कोशिश में  ज़मीन से छूटे जा रहे हैं /
दुनिया को  समेटने की कोशिश में आप खुद से ही खुद में सिमट रहे हैं हैं ,और अगर आप ये सब करके शांति महसूस करते और सच्ची ख़ुशी का अनुभव कर रहे है ,तब मुझे कहना होगा की शायद आप सही जा रहे है,और अगर नहीं तो आपको ज़रूरत है उस इंसान से प्यार करने की जिसे आप हमेशा अनदेखा करते आ रहे है हैं,और वो हैं आप। 
बस एक बार खुद से प्यार करके देखिये ,बजाय दूसरों से ये आशा करने की कि वो आप से प्यार करे ,वो आपको महत्पूर्ण समझे , आप ही एक कदम बढ़ाइए खुद से प्यार करने के लिए क्योंकि दूसरों की तरफ ना जाने कितने  कदम आपने बढ़ाये होंगे पर तब भी आपने वो नहीं पाया होगा जो आप चाहते हैं ,तो शुरू कीजिये खुद को खोजना ,शीशे में निहार लीजिये खुद को क्योंकि आपसे सुन्दर कोई और हैं नहीं ,मत सोचिये की आपका रंग क्या है,आपके नैननक्श कैसे है या फिर आप कैसे दिखते  हैं ,आप जैसे भी दिखते हो बस प्यार कीजिये खुद से,क्योंकि  आप इससे कही ज़्यादा हैं, सच कहते हैं  लोग कि  खूबसूरती ही सब कुछ नहीं है पर क्या हर्ज़ है अगर आप थोड़ा संवरने लगे सिर्फ अपने लिए ,लोग क्या कहेंगे उसकी परवाह नहीं कीजिये , लोगो के कहने की चिंता आप लोगो पर ही छोड  दीजिये न,अगर उनकी चिंता भी आप करने लगे तो लोग क्या करेंगे फिर ,उन्हें भी जीने दीजिये और आप भी  खुद के लिए जी लीजिये। 
कभी संवार  भी लीजिये अपने बालों को ,प्यार कीजिये  अपनी हर चीज़ से ,अगर मैं अपनी कहूँ तो शायद आप यकीं  नहीं मानेंगे की कॉलेज में  परीक्षा से ठीक एक दिन पहले भले ही कितना ही तनाव क्यों न  हो जाये ,मैं अपने बालों को खोल के उन्हें लहराना नहीं भूलती थी ,भले ही मेरे दोस्त मुझे उस समय पागल की संज्ञा देते हो पर मुझे ऐसा करने से बहुत ख़ुशी मिलती थी और मैं खुद को पचासों  दफा निहारती थी और हर बार यही दोहराया करती थी कि  मैं कितनी सूंदर हूँ,भले ही मैं सामान्य लगती हूँ ,पर मुझे खुद  को देख कर हमेशा यही लगता था की मैं कितनी प्यारी  हूँ  और मैं ख़ुशी से भर उठती  थी। 
आज  हम खुद को  ही भूलते जा रहे हैं ,क्यों न फिर से जिया जाये ,क्यों न फिर से अपना पसंदीदा गाना सुना जाये ,अपनी पसंद का खाना बनाया जाये  और बाकियों को भी खिलाया जाये,क्यों न हम  खुशियों की उम्मीद  लगाने की बजाये खुद ही खुशियां बाँट  आयें । 
खुद के शरीर को मापदंडो  में  उलझा कर दुखी होने से बचा जाये,स्वीकार  कीजिये खुद को आप जैसे भी हैं ,आप  बहुत अच्छे हैं और मैं यहाँ पर कहना चाहूंगी कि  है अगर आप गलत जा रहे हैं तो खुद को सुधारने में  कोई  बुराई नहीं पर जिन पर आपका वश नहीं चलता आप उन्हें खुले दिल से स्वीकार कीजिये  क्योंकि  जो आपके पास है शायद कहीं कोई उसके लिए भी तरस रहा  होगा,खुद को स्वीकारिये और संवार लीजिये  और जी जाइये। 
बाथरूम सिंगिंग अगर  आपको पसंद  है तो कीजिये ,अगर दिमाग में  कुछ न कुछ घूमता ही रहता है तो उस विषय पर  खुद से  ही बात कर  लीजिये और समाधान  ढूंढ निकालिये ,कभी कुछ पुराने पन्ने पलटिये और मुस्कुरा लीजिये  और कुछ नये पन्ने  अपनी ज़िदगी में जोड़ लीजिये और उन्हें सम्हाल लीजिये अपनी डायरी में। 
कभी जी लीजिये  अपने पहले प्यार का वो खूबसूरत एहसास ,और महका लीजिये अपनी हर सांस को  उसकी यादों  से आती हुई खुशबु से ,अगर  पूरा है तो जी जाइये नहीं तो कुछ मीठी यादों के साथ ज़िन्दगी में आगे बढ़ जाइये  ,स्वीकार कीजिये जो जैसा है उसे वैसे ही क्योंकि  बच्चन जी ने कहा हैं -मन का हो तो अच्छा न हो तो और  अच्छा ,तो बह चलिए खुद से मिलने ,खुद के प्यार में  बह जाइये जहाँ पर सिर्फ आप हो और हो बहुत सारी खुशियां  जो आपने चुनी हैं  आपने अपने लिए। 
थिरक लीजिये कभी अपनी पसंदीदा धुन  पर ,कभी गुनगुना लीजिये जो मन करे, दिमाग के आदेशों के अनुसार तो हमेशा जीते ही आये हैं कभी मन से भी जी लीजिये ,कभी सुन लीजिये मन की जो आपसे कुछ  कहना चाहता हो पर आपका दिमाग उसे चुप करा देता है। 
खिलखिला लीजिये  कभी ,परवाह करना छोड़ दीजिये  कि कोई क्या कहेगा , अजी  उन्हें भी कहने दीजिये पर आप खुद  के लिए जी लीजिये नहीं तो लोगो की परवाह करने के पीछे कभी ज़िन्दगी ही न ख़त्म हो जाये। 
इसलिए  दौड़ जाइये कभी हरे भरे खेतों में  खुले आकाश के नीचे ,तारों को देख लीजिये कभी  आपको शुक्र  और सप्तऋषि  मंडल के दर्शन हो जाये ,गुनगुनी धूप में कभी सब कुछ भूल के सो जाइये ,कभी घूम आइये अपनी  बचपन की गलियों में अपने प्यारे दोस्त के साथ और जी लीजिये फिर से वही लम्हे ,वही  कुल्फी ,वही गोलगप्पे  या जो आपको पसंद हो। 
जो आपको न समझते हो उन्हें समझाने की बजाय खुद को समझना शुरू कीजिये ,जीने दीजिये  और खुद भी जी जाइये ,ढूंढना ही है अगर तो खुशिया ढूँढ़िये ,सुकून की नींद ढूंढिए और कोशिश कीजिये पाने की  और बस जी लीजिये। 
धन्यवाद 

एक शिक्षक को कैसा होना चाहिए ??

 आज बहुत दिनों बाद मेरी एक पुरानी मित्र ने मुझसे पूछा कि मैं लिखती क्यों नहीं अब और मैं पढ़ा करती थी तुम्हारे विचार ,बस इन्हीं दो लाइन से मन ...